Lyrics: Rahul Kumar Das Music: Rahul Kumar Das द्वंद्व चले अंतर्मन में एक व्यंग चले खंजर बन के गर छल - धोखा देवों के कार्य तो हम क्यूं ना असुरों के संरक्षण में किसने तय किया नैतिकता ये जिसका भय भरा है बिकता बे जितना जय करो भयभीता से उतना तय तेरा है भिभिक्षा बे अक्षर पे अफसर के न्योछावर होते योद्धा बरगद के अजगर भी हो गए राख यहां स्वाहा जिस्म कटे इंसानों के कहीं प्रश्न उठे तूफानों से कई पापी या पुन्यात्मा सभी के भस्म उड़े श्मशानों में यहीं
कारे ये बदरा घनघोर घिर आए रे काहे तू गरजे काहे प्रलय मचाए रे
आग ये जली जो लाल सी काल है सब तबाह काज ये कली का ताक लो खुद में तुम इक दफा अभी सोच में होंगे हरि खुद में कहीं राख ही जाए बस सतयुग में भर के सब जन में काम क्रोध कली नाच रहा है कलियुग में अवसर पे ही भ्रमित मति है किस्मत तेरी अडिग डटी है असुर या देव की परिभाषा ना कोई निर्भर है सब परिस्थिति पे जान के जान लें अर्ध ज्ञानी ये अर्जित कर थोड़ी शिक्षा काल से पहले कर्मा नाचे करे तिरकिट धा तिरकिट धा अज्ञात सभी और झूठे तथ्य सम्राट- प्रजा सब एक गत्य जैसे अंत एक शुरूआत है वैसे शुरूआत मृत्यु और मृत्यु सत्य