Lyrics: Saurabh Jha Kumar Music: Manav P Manikandan दिन यूँ ही निकल जाते, रात आके ढल जाती, ज़िंदगी है जैसे कोई बोझ-सी चल जाती। कुछ करने का नहीं दिल, ना कोई और उमंग है, बस खालीपन साथ मेरा, ये दर्द-सा संग है। लोग कहते, "कुछ तो कर, बन जा कामयाब," पर मैं तो हारा हुआ, टूटा-सा एक ख़्वाब। हर कोई आगे, आगे मेरे मेरी मंज़िल है कहाँ कर दिखाऊँ सबको ये, बन कर मैं कामयाब। मैं परिंदा हूँ, जिससे कुछ समझ नहीं आता था कभी कहीं, बिन दौलत संग मेरे, ना पहचाना किसी ने, ख़्वाबों को ले चलूँ, पर शाम ये है ढल रही अभी। जैसा ये दर्द है, अब और जिया न जाए। कोशिशें ये सारी मेरी, हार बन गईं, जीत न मिली जो मुझको, बात टल गई। सारे अपने, सारे सपने जो छोड़ गए मुझको अपनाकर... बिखरे – जो बिखरे, ये सपने मेरे सारे बिछड़े। मैं परिंदा हूँ, जिससे कुछ समझ नहीं आता था कभी कहीं, बिन दौलत संग मेरे, ना पहचाना किसी ने, ख़्वाबों को ले चलूँ, पर शाम ये है ढल रही अभी। जैसा ये दर्द है, अब और जिया न जाए। आदतें जो तेरी, तुझको ही बिखराएँ, मन्नतें मैं करूँ, तेरा सवेरा आए। ये दर्द तेरे, जो अपने दें, क्यों तुझको ये तड़पाएँ। ना समझ, यूँ बैठा तू, सब तुझको ही समझाएँ। बेपनाह...